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दिल्ली में एकजुट होंगे देश के मनरेगा कर्मी, काम के हिसाब से पैसे की मांग को लेकर सरकार का घेराव

दिल्ली में एकजुट होंगे देश के मनरेगा कर्मी, काम के हिसाब से पैसे की मांग को लेकर सरकार का घेराव

अखिल भारतीय मनरेगा कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव श्री चिदानंद कश्यप ने बताया कि मनरेगा योजना के कारण देश के गांवों की सूरत बदल रही है, लेकिन 12-13 वर्ष बीत जाने के बाद भी मनरेगा कर्मियों की दशा नहीं बदल रही है.
देश के सभी राज्यों के मनरेगाकर्मियों का जमावड़ा राजधानी दिल्ली में हो रहा है. 31 जनवरी से 2 फरवरी 2019 तक अखिल भारतीय कर्मचारी महासंघ के आह्वान पर सभी मनरेगा कर्मी इकट्ठा हो रहे हैं. अपने आठ सूत्री मांगों को लेकर इनका प्रदर्शन होने जा रहा है.

इसकी सूचना अखिल भारतीय मनरेगा कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव श्री चिदानंद कश्यप ने बताया कि मनरेगा योजना के कारण देश के गांवों की सूरत बदल रही है, लेकिन 12-13 वर्ष बीत जाने के बाद भी मनरेगा कर्मियों की दशा नहीं बदल रही है. उन्होंने कहा है, “विगत 12 -13 वर्षों से मनरेगा कर्मी संविदा एवं अल्प मानदेय पर इसी आशा और उम्मीद के साथ अपनी सेवा निर्वाध से देते आ रहे हैं कि भविष्य में या तो इनकी सेवा केंद्रीय कर्मचारी के रूप में स्थाई कर दी जाएगी अथवा राज्यों में समकक्ष पदों पर सीधे समायोजित कर ली जाएगी, जिससे मनरेगा कर्मी विशेषकर रोजगार सेवक अपना और अपने परिवार की निरंतर बनी हुई अभावग्रस्त स्थिति को एवं अंधकार लग रहे भविष्य को उज्जवल बना सकेंगे. किन्तु अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि विगत 12-13वर्षों में मनरेगा के सफल कार्यान्वयन के लिए सरकार द्वारा एक हजार से अधिक बार नियमों में संसोधन किया गया. बहुत से सर्कुलर एवं आदेश जारी किए गए. उसके प्रावधानों को संशोधित किया गया, लेकिन इस दौरान मंगाई एवं अन्य बदलाव जिससे जी के साथ हुए हैं उसके अनुसार मनरेगा कर्मियों की एवं उनके परिवार की कोई सुध नहीं ली गई .

उन्होंने कहा कि बहुत सारे काम करने के बाद भी एक मनरेगा कर्मी को चपरासी के बराबर भी वेतन नहीं मिलता है. एक चपरासी को 10:00 बजे से 5:00 बजे तक अपनी ड्यूटी में 40000/- से 45000/- रुपये तक मासिक वेतन एवं सारी सरकारी सुविधाएं दी जाती है, लेकिन एक रोजगार सेवक को मात्र 5000 से ₹6000 और वह भी नियत समय पर नहीं मिलता है और तो और दिए गए लक्ष्य के अनुसार मानव दिवस सृजित नहीं होने पर वह पैसा भी काट लिया जाता है जो कि बहुत ही दुखद और चिंता जनक है.

उन्होंने कहा कि मनरेगा कर्मियों से उनके कामों के अलावा ब्लॉक के पदाधिकारियों और जिला प्रशासन के पदाधिकारियों द्वारा भी काम लिया जाता रहा है और आज भी लिया जा रहा है, जिसके लिए किसी प्रकार का कोई भत्ता भी नहीं दिया जाता है जब कि मनरेगा के गाइड लाइन में स्पष्ट लिखा हुआ है कि मनरेगा कर्मियों को मनरेगा के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य ड्यूटी नहीं दी जानी है.

उन्होंने बताया कि झारखंड में 64 दिनों तक मनरेगा कर्मियों की हड़ताल चली, उड़ीसा में दो महीने से हड़ताल जारी है. इसी प्रकार ने राज्यों में भी हड़ताल चल रहे हैं मांगें उठ रही है और न तो कोई सुनने वाला है न ही समझने वाला. इन तमाम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाई गई है जिसमें निम्नांकित मांगों और बिंदुओं पर विचार विमर्श किया जाना है:

1. मनरेगाकर्मियों खासकर रोजगार सेवकों को केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन ₹24000 के आलोक में जो कार्य अनुभव के अनुसार ₹30000 कम से कम नियत किया जाए.

2. मनरेगा कर्मियों को डाक और वन विभाग के तर्ज पर केंद्रीय कर्मचारी घोषित करते हुए केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही समस्त ग्रामीण योजनाओं के क्रियान्वयन में योगदान लिया जाए अथवा मनरेगा कर्मचारियों को राज्यों के समक्ष पदों पर समायोजित करने के लिए प्रावधान बनाते हुए गाइडलाइन जारी किया जाए एवं मनरेगा कर्मियों को और अधिकार और कार्य दिया जाए.

3. मनरेगा कर्मचारियों को पूरे देश में एक समान मानदेय दिया जाए. अभी विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मानदेय निर्धारित है.
4. मनरेगा कर्मियों का तत्काल प्रभाव से वेतन कंटिजेंसी आधारित मानदेय के बदले वेतन कोष गठित कर उससे नियमित भुगतान का आदेश दिया जाए.
5. सेवा शर्त लागू करके सेवा पुस्तिका दी जाए.
6. मनरेगा कर्मियों को स्थाई कर्मचारियों के समान स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना मुआवजा, ईपीएफ कटौती, अनुकंपा के आधार पर नौकरी एवं विभिन्न प्रकार की भक्ता जैसे महंगाई भत्ता यात्रा भत्ता आदि की सुविधाएं दी जाए.

7. महात्मा गांधी रोजगार गारंटी परिषद में महासंघ के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में मनोनीत किया जाए ताकि अपनी बातों को सही जगह पर सही रूप से रख सकें.

8. मनरेगा मजदूरों की मजदूरी को महंगाई के अनुसार संशोधित कर वृद्धि की जाए। जहां बाजार में दैनिक अकुशल मजदूरी बढ़कर 400- 500 रुपए हो गई है वहीं पिछले चार वर्षों में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी यथावत रखी गई है जिसके कारण गांव में काम करने वाले मजदूर पलायन को विवश हैं.

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